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संभल हिंसा से जोड़ने के आरोप पर वकील विष्णु जैन का दावा— राजनीतिक लाभ के लिए सोशल मीडिया पर की गई छवि धूमिल करने की साजिश

अखिलेश यादव के खिलाफ वकील विष्णु शंकर जैन ने दायर किया मानहानि केस, पटियाला हाउस कोर्ट में याचिका

नई दिल्ली। अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे संवेदनशील धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में हिंदू पक्ष की पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है। यह याचिका दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में दाखिल की गई है।

विष्णु शंकर जैन का आरोप है कि नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक विवादित धार्मिक परिसर के कोर्ट कमिश्नर सर्वे के दौरान हुई हिंसा के लिए अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया। उनके अनुसार, ट्विटर (अब एक्स) पर किए गए इन पोस्ट्स में उन्हें हिंसा का मुख्य कारण बताने की कोशिश की गई, जो पूरी तरह झूठी और तथ्यहीन है।

याचिका में कहा गया है कि विष्णु शंकर जैन कोर्ट के स्पष्ट आदेश के तहत एक अधिवक्ता के रूप में अपनी कानूनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे थे। वे न तो सर्वे प्रक्रिया के निर्णयकर्ता थे और न ही किसी प्रकार की प्रशासनिक भूमिका में थे। इसके बावजूद, राजनीतिक लाभ और विशेष समुदाय को साधने के उद्देश्य से उनके खिलाफ जानबूझकर भ्रामक और मनगढ़ंत आरोप लगाए गए।

विष्णु शंकर जैन का कहना है कि अखिलेश यादव और उनकी पार्टी द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए बयान न केवल उनकी पेशेवर साख को नुकसान पहुंचाने वाले हैं, बल्कि इससे उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा को भी खतरा उत्पन्न हुआ है। उन्होंने अदालत से कहा है कि इन पोस्ट्स के कारण उनकी छवि एक जिम्मेदार अधिवक्ता के बजाय एक विवादास्पद व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत की गई, जिससे समाज में उनके प्रति नकारात्मक धारणा बनी।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि एक अधिवक्ता के खिलाफ इस तरह के सार्वजनिक आरोप न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान हैं और इससे अदालत के आदेशों का पालन करने वाले अधिकारियों और वकीलों का मनोबल भी प्रभावित होता है।

दिलचस्प बात यह है कि विष्णु शंकर जैन ने इस मानहानि मामले में अखिलेश यादव से केवल 1 रुपये की प्रतीकात्मक क्षतिपूर्ति की मांग की है। उनका कहना है कि यह मामला धनराशि का नहीं बल्कि सम्मान, सच्चाई और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी का है। वे अदालत के माध्यम से यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि बिना तथ्यों के किसी व्यक्ति को हिंसा के लिए दोषी ठहराना अस्वीकार्य है।

कानूनी जानकारों का मानना है कि यह मामला राजनीतिक बयानबाजी और न्यायिक प्रक्रिया की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। फिलहाल अदालत ने याचिका को स्वीकार कर लिया है और मामले में आगे की सुनवाई की तिथि तय की जानी है।

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